कॉलेज के दिन और हॉस्टल की शामें

यूँ चलते थे हाथों में यारों को थामे
जादू अलग था उस आब-ओ-हवा में
आँखों में अब भी ज़िंदा है पल वो
कॉलेज के दिन और हॉस्टल की शामें

वो बर्थडे पर यारों से लातों का खाना
फिर जा के कैंटीन पर मैगी खिलाना
यारों से कुछ सौ उधारी के पल वो
मांगे जब उसने तो बातें बनाना

वो चहलकदमी हर शाम करना
कुछ दीवारें उसके नाम करना
उसकी किताब का पुराना गुलाब
काँधे पर उसके ही आराम करना

सबके टूटोरियल से पन्ने चुराकर
वजनी से पन्नो की गड्डी बनाकर
प्रोफेसर के आगे वो भोली सी सूरत
पकड़ा तो भागे थे आँखें चुराकर

हॉस्टल की यूँ तो थी ऊँची दीवारें
पर हमको कैसे न रस्ते पुकारें
रातों में सड़कों को आशियाँ बनाकर
डरपोंकों का जैसे डेयर संवारें

हॉस्टल में था वो अकेला सा रूम
सुनते थे भूत वहां रहे हैं घूम
दरवाजे पे उसके सीको जलाकर
भूतों के दिल में मचाई थी धूम

मेस के वो पतले आलू टमाटर
कई साल बीते हैं उनको ही खाकर
अरहर की दाल और भिन्डी की सब्जी
खाते थे यारों की महफ़िल जमाकर

क्रिकेट पर यारों से चाय की शर्तें
टीवी के आगे नौटंकी थे करते
लैपटॉप एक और यारों की टोली
सिमटती नहीं उन रातों की परतें

उस पल में अब भी खोया हुआ मैं
यारों की यादों में सोया हुआ मैं
वापस मिलेंगे नहीं अब वो लम्हे
कॉलेज के दिन और हॉस्टल की शामें

-#विकास_भांती

2 Comments

  1. virendra pandey VIRENDRA PANDEY 16/02/2015

Leave a Reply