उठ उठ बूला -1

बकलोल बूला जी के लिए आज का दिन स्पेशल या उनके शब्दों में कहें तो सपेसल था | वैलेंटाइन डे के बचपन से शौक़ीन बूला जी जीवन के 28 वसंत बीतने के बाद भी इस दिवस का आनंद लेने से अनछुए थे | पर इस दिन पर पूरा अधिकार था बूला जी का |
बताते रहें कि आज ही के दिन इनकी दादी ने दादा को बेलन तान के मारा था तभी से बेलन तान डे मनाया जाने लगा | स्वाभाव से बहुत सज्जन पर अक्ल से बड़े बकलोल बूला जी आज खुश थे | उनको भी बेलन तानने वाली मिल गई थी |
घर से नया भकाभक जरीदार कुरता पहन और काँधे पर इत्र लगा बूला जी ने निकलने से पहले घर की देहरी को प्रणाम किया और कबड्डी के खिलाड़ी के अंदाज़ में मैदान में कूद पड़े | कल ही पान वाले शुक्ला को हिंदी और अंग्रेजी कि पीड़ा समझा रहे थे |”अबे ! हिंदी में बोलो तो कौनो और ही मतलब निकलता है . अब देखो डेट और तारिख एक दूसरे के ट्रांस्लेसन हैं पर तारिख ब्लैक डे होता है और डेट पिंक |” अब शुक्ला को कितना पल्ले पड़ा यह शुक्ला ही जाने पर मुझे ज्ञान की गंगा मिल गई |
बूला जी मगन हाथी कि तरह (हालाँकि इनके शारीरिक सौष्ठव को देखते हुए हाथी कहना , हाथी की मानहानि होगी) सड़क पर इधर उधर डोल रहे थे रस्ते चलते हर तुक्केबाज़ को बेलन तान डे की मुबारकें भी देते जा रहे थे , तभी किसी कनपुरिया मसालेबाज़ ने ऐसा निशाना साध के पीक मारी की बूला जी का सफ़ेद कुरता चित्तीदार हो गया | गुस्से के मारे बूला जी वहीँ ज़मीन पर बैठ गए और उठने का नाम ही न लें | बहुतों नें उनको हिलाने का प्रयास किया पर बूला जी टस से मस न हुए | आप सब भी कोशिश कर लो, तो भाइयों बहनों और गर्ल फ़्रैंडों(आज के दिन इस शब्द का उपयोग मान्य ही होना चाहिए ) सब मिल के बोलो “उठ उठ बूला ”

-‪विकास भांती‬

Leave a Reply