मैं चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले

मैं चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले
उसे समझने का कोई तो सिलसिला निकले

किताब-ए-माज़ी  के औराक़ उलट के देख ज़रा
न जाने कौन-सा सफ़्हा मुड़ा हुआ निकले

जो देखने में बहुत ही क़रीब लगता है
उसी के बारे में सोचो तो फ़ासिला निकले

अर्थ:

  1. किताब-ए-माज़ी – अतीत की पुस्तक
  2. औराक़ –  पन्ने
  3.  सफ़्हा – पन्ना

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