लेखिनी चलती रही

लेखिनी चलती रही और मैं लिखता रहा |
लोग मरते ही रहे और मैं बिकता रहा ||
भूखे बच्चों कि कहानी कागज़ो को सौंपकर,
महफिलें सजती रहीं और मैं दिखता रहा ||

वो भूख से लड़ते रहे,मैं शब्द से बुनता रहा |
वो खिलखिलाहट मौन थी और मैं सुनता रहा ||
शमशान की मिटटी से मैंने,घर कि ईंटें जोड़ लीं |
हाथ उनका जो बढ़ा,मैंने नज़रें मोड़ लीं ||

उनके दर्दों को बयां कर,मैंने वाहवाही भी लूटी |
कागज़ों पर जो लिखी थीं , दास्तानें वो थीं झूठीं ||
उन बेचारों की कहानी, सहेज कर रखता गया |
लोग मरते ही रहे, और मैं बिकता रहा ||

विकास भांती

Leave a Reply