अख़बार की ज़मीन पर

लिखी जा रही हैं कविताएँ
अख़बार की ज़मीन पर ।

फड़फड़ा रहे हैं कहानियों के पन्ने
पुस्तकालयों के रैक्स पर ।

खींसें निपोर रहे हैं श्रोता
मंच के मसखरों पर ।

बाँग दे रहे हैं आलोचक
टी०वी० स्क्रीन पर ।

मंत्रणा हो रही है विद्वान, मनीषियों में
कि बाँझ हो गई है लेखनी।

उधर जंगल में नाच रहा है मोर !

Leave a Reply