दंगा

“वो लोग इधर ही आ रहे हैं. अब हमारे बचने कि कोई सम्भावना नहीं है.” वो इतना ही बोल पाया था कि उसका घर धू धू कर जल उठा, ऐसा लगा मनो आग का दरिया फूट पड़ा हो. हर ओर बस लाल रौशनी ही दिखाई देती थी और इन लपटों में वो और उसका पूरा परिवार जल के राख़ हो गया. चंद पल में सब खाक हो गया.

वो मर चुका था और उसका सूक्ष्म शरीर बस पड़ोसियों कि आग बुझाने कि असफल कोशिश को निहारने में लगा था, जाने मेरा बेटा कहाँ है और मेरी बेटी वो तो अभी गुड़ियों से ही खेल करती थी. खैर अब जलन समाप्त हो चुकी थी और १ असीम शांति का अनुभव हो रहा था.

“अरे ये तो मैं हूँ, अधजला, पहचान में भी नहीं आ रहा.” सहसा अपने मृत शरीर को देख के उसके मुँह से निकला. “पर मेरे बच्चे? शायद वो ज़िंदा हों!”

दंगों कि बलि चढ़ चुका था उसका पूरा परिवार. जो लोग उससे; रोज़ खैरियत पूछते थे आज उसकी ओर देख भी नहीं रहे. वो चिल्ला रहा था, देखो मैं इधर हूँ, अरे मैं सही सलामत खड़ा हूँ . पर कोई उसकी आवाज़ सुनने को तैयार ही नहीं था. तभी अचानक किसी कि आवाज़ आई, भाई तुम भी इन दंगाइयों कि भेंट चढ़ गए.१ जाना पहचाना चेहरा जो उसे रोज़ दिखता था पर अलग धर्म का होने की वजह से दुआ सलाम कभी नहीं हुई.

तुम….. तुम मुझे देखा सकते हो?…………….. हाँ भाई मैं भी आपकी ही तरह इन दंगों में मारा गया हूँ. सहसा संवाद कि एक धरा फूट पड़ी. पर तुम तो उनके अपने थे? ……… था तो पर दंगाइयों का हुज़ूम अपने और पराये में भेद कहाँ कर पाता है. उस समय तो बस नफरत का एक सैलाब चल निकलता है और जो भी बीच में आता है जल के राख़ हो जाता है.

भाई अगर इज़ाज़त हो तो एक सवाल पूछना चाहता हूँ, एक ने दूसरे से पूछा…… जी बिलकुल….. पूछिए क्या पूछना चाहते हैं…… हम दोनों के धर्म अलग हैं. रीति रिवाज़ अलग हैं. मान्यताएं अलग हैं पर आज शरीर से अलग हो जाने के बाद क्या हम दोनों में कोई अंतर बचा है?……. हो सकता है अगले जन्म में तुम मेरे धर्म में और मैं तुम्हारे धर्म में जन्म लूँ, फिर हम क्यूँ लड़ते रहे ज़िन्दगी भर……..

सवाल बड़ा था जिसका उत्तर दोनों के ही पास नहीं था… और फिर गहरी ख़ामोशी के बाद ये संवाद ख़त्म हो गया……………

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