तबस्सुम

सिहर उठता हु आज भी तुम्हारे अहसास से ,
गुजरता हु जब भी तुम्हारे आसपास से
वफ़ा की उम्मीद तो हमे खुद से नहीं थी ,
क्यों बेवफाई का ये कारनामा तुमने किया
तुम्हे खो देने का डर तो मन में था ,
इस डर को यकीन में तुमने बदल दिया
क्या गुस्ताखी हुई थी मुझसे ,
जो तुमने मुझे धोखा दिया
खिलखिलाती सी तबस्सुम के कायल तो हजारो थे ,
इजहार का मायदा तो हमने ही किया
हमने अपनी आँखों से देखी थी अपनी तबाही ,
ज़माने ने तुम्हारी बेवफाई भी सराही
मगरूर से इस ज़माने की बातो में आकर ,
क्यों तुमने हमको दगा दे दिया !!!!!!!!!

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