एक जमाने बाद-गजल-शिवचरण दास

वो सूनी महफिल में आया एक जमाने बाद
पायलिया ने रंग जमाया एक जमाने बाद.

आंख बचाकर सपने सारे दूर कहीं उड जाते थे
अबकि मिलकर वो शरमाया एक जमाने बाद.

धुन्ध भरा दर्पण कोने में लावारिस था पडा हुआ
उसने आंचल से चमकाया एक जमाने बाद.

जिसके एक इशारे पर सारे बन्धन तोड दिये
सम्मोहन का जाल बिछाया एक जमाने बाद .

आंख मे जादू लब पर नग्मे चेहरे पर है मुस्कान
सपनो मे सब रस छलकाया एक जमाने बाद.

अन्धकार की गहरी चादर जब चन्दा को लील गइ
तब तारे ने पथ दिखलाया एक जमाने बाद.

सर्द हवा मे जलते जलते रात सुलगती जाती है
बीती यादों को दुहराया एक जमाने बाद.

दास सफर ये है दुख का इसका कोई छोर नहीं
सुख ने सौतन सा फुसलाया एक जमाने बाद.

शिवचरण दास

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