कहीं मेरी उम्मीदें बेमानी तो नहीं

कहीं मेरी उम्मीदें बेमानी तो नहीं
जो सबसे चाहता हूँ
मिल नहीं पाता
जो तुमसे चाहता हूँ
खिल नहीं पाता
अक्सर लौटता हूँ नाउम्मीदी लिए
कहीं इसके भी कोई मानी तो नहीं
जो किया गहरा तो मिलेगा
बेहतर ही
पीड़ा हुई कि मिला
कमतर ही
सोचकर कटी यही ज़िन्दगी कि
अदावत से अदावत में कोई हानि तो नहीं
कहीं मेरी उम्मीदें बेमानी तो नहीं
बड़ा चुपचुप हूँ सोचकर कि
क्या है कल कि परतों में
बेचैन भी हूँ जानकर कि
कुछ भी शामिल नहीं है शर्तों में
हदों की अकीदत में शामिल ज़िन्दगी भी थी लेकिन
खामोश लबों को पहचान ले इतनी सायानी तो नहीं
कहीं मेरी उम्मीदें बेमानी तो नहीं
दर्द पन्नों पे उत्तर आता है
कहता ही नहीं
आसुओं का समंदर पाले है
बहता ही नहीं
हर एक नज़्म के सुख से डरा सा रहता हूँ
कि ये सुख ये ख़ुशी ये लफ्ज़ नादानी तो नहीं
कहीं मेरी उम्मीदें बेमानी तो नहीं

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