दरंदुम

तुम्हारी नजरो के वार से हम तो न बच पाये ,
वो दर्द तो अब भी हमको सताए ,
मसरूफियत उलफ़त की इजाजत नहीं देती है ,
धड़कन समय को पीछे छोड़ देती है ,
तेरी याद में दोजग भुगत रहे है ,
जन्नत नहीं न सही दरंदुम के काबिल समझते तो सही ,
द्वारे दिल में कभी दस्तक दी तो होती ,
हम तुम्हे वापस जाने देते ही नहीं ,
तुम्हारी खुशियो की परवाह तो हमें भी है ,
खुशियो से भरा एक जहाँ और भी है |

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