अपने फन का बडा उस्ताद-गजल-शिवचरण दास

अपने फन का बडा उस्ताद होता जा रहा है
हर कोई बर्बाद वो आबाद होता जा रहा है.

हर रात महंगी सुरा नोचता है बोटियां
वो यहां इक खरा इन्सान होता जा रहा है.

कातिलों को मिल गया ठेका हमारी जान का
इसलिये हर रोज कत्ले आम होता जा रहा है.

इस शहर में घुस गया है एक सच्चा आदमी
आजकल चरचा यही कुछ आम होता जा रहा है.

हर किसी ने फेर ली नजरे यहां पर बेवजहा
दास अब इस कदर बदनाम होता जा रहा है.

आंधियों में हम चले हैं सत्य का लेकर चराग
जिन्दगी का रास्ता गुमनाम होता जा रहा है.

शिवचरण दास

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