ये सन्नाटा…

मुझसे पूंछता है रात का ये सन्नाटा
होगी आखिर सहर कब होगी ?
कब जलेगा वो आग का गोला ?
आखिर कब वो पहर होगी ?
कब तक बनाएं रखनी होगी यूं ही ख़ामोशी ?
कब तक रखना पड़ेगा यूं ही होठो को सिल कर ?
कब तक मेरे सांसों का भारीपन मेरे ही जिस्म हो सालता रहेगा ?
कब तक मेरे धड़कनों की धड़ धड़ मेरे खूँ को उबलता रहेगा ?
कब तक हवाओं का दामन पकड़ के
रात रात भर जागना पड़ेगा ?
कब तब बनायेंगे बस्ती अंधेरी ?
कब तक अंधेरो को फाँकना पड़ेगा ?
ये उतरन उजालो की जो बच गयी थी
कब तक उन्हें जिस्म पे डालना पड़ेगा ?
आख़िर कभी तो ये पौं फटेगी
आख़िर कभी तो सवेरा उगलेगा सूरज
कभी तो होगा फिर से आवाज़ ज़िन्दा
आख़िर कभी तो उजालो की आहट से
ठहरे हुये इन सहमे पलों में
आयेगी हिम्मत के बोलेंगे ये भी
नही होना दफ़्न रात के इस कुँए में
के रहता जहाँ सिर्फ़ ख़ामोशी खाली
अपनी ही आहट में खुद को समेटे
खुद अपने लिये ही बना वो सवाली
तो मुझको भी थोड़ी सी हिम्मत मिलेगी
मेरे भी बरसो से सूखे गले में
आयेंगी चीखें
के चीखूंगा मै भी
चीखूंगा ऐसे के बरसेंगे बादल
नदियां बहेंगी समंदर बहेंगे
और बह जायेंगे रातों से अंधेरो के कालिख़
सुबहे रहेंगे सवेरे रहेँगे
भूले से फिर न अंधेरे रहेंगे.

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