कहां एसा हुनर-गजल-शिवचरण दास

हर किसी के हाथ में है कहां एसा हुनर
फूल की पत्ती से ही काटे पत्थर का जिगर.

मोम के पुतले जीते हैं लडाइ सूर्य से
बर्फ के बीच बसता अंगारो का शहर.

खन्जरों की नोकं पर नाचती है जिन्दगी
ओंठ पर मुस्कान पर आंख मे इसके जहर.

दर्द की उंची मीनारों के वाशिन्दे हम बने
अपनी गजलों में भरा है शिकस्तों का सफर.

उसने देखा इस तरह जैसे हो कोई अजनबी
हमने माना था जिसे अपना सच्चा हमसफर.

जो महफिल में लदा है फूल के गजरों से युं
उसने सबको ही दिया है झूंठ का पैगाम भर.

दास कातिल आज मेरा हो गया मुन्सिफ यहां
अब तो करना है उसे बस कत्ल का एलान भर.

शिवचरण दास

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