कृष्णा

मेरी हर सुबह की शुरुवात उसकी ज़ोर की हुंकारों से हुआ करती थी | सुबह 6 बजे ही घर के बाहर उसकी हुह की आवाज़ें गूंजने शुरू हो जाती थी | किसी को उसकी ये आवाज़ अच्छी लगती तो किसी को नापसंद भी थी | पर वो ऐसा ही था, २ घंटे बेहिसाब दौड़ता हुआ कृष्णा अपने पिता का दुलारा था कहने को घर का बड़ा बेटा पर शायद सबसे छोटा | 8 साल की उम्र में माँ के साथ जाते हुए घटी उस दुर्घटना नें माँ को छीन लिया और उसे 8 साल का ही कर के छोड़ दिया | 19 साल के कृष्णा में ह्रदय आज भी आठ वर्ष के बालक का ही धड़कता था |

पर प्रभु की माया देखो उसने बुद्धि हरी तो एक और चमत्कारिक गुण कृष्णा को प्रदान कर दिया था | कृष्णा घोड़े की रफ़्तार से दौड़ा करता था और मिनट क्या घंटे भर दौड़ने के बावजूद उसकी गति में कोई कमी महसूस नहीं होती थी | बाघ सी चौड़ी छाती और चीते जैसी चपलता पर ह्रदय एक बच्चे का | कृष्णा के यह गुण उसे अपने परिवार का चहेता बनाते थे | भले औरों की नज़र में कृष्णा एक पागल था पर पिता की नज़र में वो एक चमत्कारिक बालक था | और शायद यह पिता का प्रेम भर नहीं था , कुछ खास था उस लड़के में | सड़क पर भागते हुए उसके चेहरे पर एक ऐसी असीम शांति नज़र आती थी जैसे किसी कन्दरा में बैठ ईशभक्ति में लीन साधू की मुख पर होती |

कृष्णा के पिता जवाहर लाल जी एक बैंक में क्लर्क थे | कई साल पहले पत्नी को खो देने के बाद पिता की जिम्मेदारी बढ़ी तो जवाहर जी को दूसरा विवाह करने पर मज़बूर होना पड़ा | सौतेली माँ बुरी नहीं थी पर नन्हे कृष्णा के उपद्रव उसे कई बार उसपर हाथ उठाने को मज़बूर कर देते थे फिर भले ही पड़ोसियों के सौतेली होने के ताने अक्सर उसके कानो में पड़ते रहे | माँ की सख्ती ही थी जो कृष्णा मष्तिष्क से परिपक्व न होने के बावजूद एक अनुशासित बालक था |

पिता ने ये जानते हुए कि कृष्णा पढाई में दूसरे बालकों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता उसे इस प्रकार गढ़ा था कि वो हर किसी का चहेता बन रहा था | बचपन से कृष्णा यही सुनता आया था कि एक दिन उसे सबसे तेज़ दौड़ना है और पिता का सपना भी था कि उनका बेटा एक दिन दौड़ की प्रतियोगिता में स्वर्ण जीतेगा |

कृष्णा का यह इंतज़ार या यूँ कहें उसकी ट्रेनिंग पिछले दो वर्षो से जारी थी | हर सुबह वो चीते की रफ़्तार से बिना रुके डेढ़ घंटे दौड़ता ही रहता था और दूर खड़े उसके पिता हाथ में स्टॉप वाच लिए उसे निहारा करते थे | शायद कोई लक्ष्य था पिता के मन में और उसे पाने कि उत्कंठा उनके चेहरे पर हमेशा ही दिखा करती थी | इस दौड़ के बाद कृष्णा दर्जन भर केले और डेढ़ पाँव दूध यूँ गटक जाता था जैसे मैं सुबह 4 बिस्किट खाकर अपना रात का उपवास तोड़ा करता था |

और शायद एक दिन वो लक्ष्य पूर्ण हो गया क्योंकि पिता के माथे पर गर्व की लकीरें उस दिन साफ़ दिखने लगी थी | समय भी सही था अगले ही महीने जिला स्तर पर होने वाले खेलों के लिए चयन की प्रक्रिया प्रारम्भ होने को थी |

समय रेत की तरह फिसलता हुआ शहर के उस बड़े से स्टेडियम पर आकर ठहर गया | बन्दूक की गोली की ठाय की आवाज़ और हर एक प्रतियोगी की अपनी अपनी लेन में लक्ष्य की तरफ बढ़ने की प्रक्रिया शुरू हो गई | कृष्णा बिना किसी को देखे अपनी ही धुन में उस ट्रैक पर भागे जा रहा था और उसे इस बात का तनिक भी इल्म नहीं था की 400 मीटर की वो दौड़ उसने अपने दूसरे प्रतियोगी से तीन चौथाई समय में ही पूरी कर ली थी | उस स्टेडियम में हर कोई खड़ा होकर कृष्णा के लिए तालियां बजा रहा था और अगले दिन हर अखबार में कृष्णा शीर्षक था |

पिता का ह्रदय आज बहुत खुश था | उसे गर्व का अनुभव हो रहा था 6 महीने बाद होने वाली उस जिला प्रतियोगिता में कृष्णा का चयन उसके लक्ष्य की तरफ पहला कदम था | अब कृष्णा अपने जिले की जर्सी पहन रोज़ सुबह स्टेडियम पहुंच रहा था और शायद उसे भी इल्म था कि कुछ बड़ा हो रहा था उसके जीवन में |

अब सिर्फ एक महीना बचा था कि एक शाम एक फ़ोन आया कृष्णा के पिता को और उसे नगर के विधायक और सरकार में मंत्री के आवास पर बुलाया गया था | पिता ने अपनी शादी का पुराना सूट निकाला और उसे कृष्णा को पहना कर विधायक जी के घर पर पहुंच गया |

जाते ही भव्य स्वागत हुआ , पिता फूला नहीं समा रहा था और बार बार बेटे को प्रेम दृष्टि से निहारे जा रहा था | लगभग 30 मिनट के बाद विधायक जी नें उन्हें अपने कक्ष में आने का बुलावा भेजा और जवाहर लाल बेटे का हाथ पकड़ कर भीतर की ओर बढ़ चला | भीतर विधायक जी एक 22 साल के युवक के साथ बैठे थे ,”जवाहर लाल जी आइये | इनसे मिलिए ये हैं आशीष वैसे तो भतीजे हैं मेरे पर आपके बेटे के साथ ही हैं टीम में | इनको आपके सहयोग कि आवश्यकता है | मना मत कीजियेगा | ” विधायक जी बड़े प्रेम से बोल रहे थे |

विधायक जी नें इस अपनत्व से जवाहर जी का हाथ थामा कि मुंह से ना नहीं निकल सका | कुछ आशंकित भाव से कृष्णा विधायक का मुंह ताक रहा था | विधायक नें आगे कहना शुरू किया ,”जवाहर जी आपका बेटा वैसे भी दिमागी रूप से अशक्त है अगर जीत भी गया तो आगे क्या | ओलिंपिक तो दौड़ नहीं लेगा और सुनने में आया है कि इस प्रतियोगिता के विजेता को राष्ट्रीय स्तर पर दौड़ने का मौका मिलेगा | यह हैं कागज, मैं आपके बेटे को अकादमी में सहायक कोच नियुक्त करता हूँ आप बस इस का नाम प्रतियोगिता से वापस ले लीजिये | ”

पिता हतप्रभ था , किंकर्तव्यविमूढ़ सा विधायक और उसके भतीजे को देखता रह गया | एक अजीब सी सिहरन पूरे बदन में दौड़ने सी लगी थी | कृष्णा पिता के चेहरे को देख रहा था | जवाहर लाल जमा हुआ सा बेटे को कुछ बोलने में असमर्थ अनुभव करता बेटे को निहार रहा था कि बेटे नें सामने पड़ा कलम हाथ में लेकर उस कागज पर अपने दस्तखत थोप दिए और पिता का हाथ पकड़ उस चहारदीवारी से बाहर आ गया | जवाहरलाल अभी भी बस बेटे को देख रहा था और तय नहीं कर पा रहा था कि अपने बेटे को गले से लगाए या उसके हाथ का वो कागज कचरे के सुपुर्द कर दे |

-#विकास_भांती

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