झूठ भी सच्चे लगते है

!!! झूठ भी सच्चे लगते है !!!

जिंदगी एक ऐसी पहेली जिसमे
कुछ झूठ भी बड़े सच्चे लगते है
चाहे कितनी बड़ी हो जाए औलाद
माँ-बाप को फिर भी बच्चे लगते है (( १ ))

दुनिया का नजरिया है कुछ ऐसा
अपनेपन में सब कुछ अच्छे लगते है
खुद के शैतान भी बच्चे तो है शरीफ
दुसरो के तो सच्चे भो झूठे लगते है (( २ ))

कुछ ऐसा ही मंजर होता है जैसे
लोमड़ी को दूर के अंगूर खट्टे लगते है
ऐसे दुसरो के पके आम भी खट्टे लगे
और अपने कच्चे अंगूर भी मीठे लगते है (( ३ ))

ये तो असर है खुदा की खुदाई का
जो सबको अपने-अपने अच्छे लगते है
कोई दुर्योधन हो या दुश्शासन जैसा
माँ की नजर से देखो सब अच्छे लगते है (( ४ ))

क्या कहे दुनियादारी की यहाँ तो
लोगो को सीता में भी दोष नजर आता है
जब बात होती है अपनी बीवी को तो
कैकेयी भी सबकी अच्छी लगती है (( ५ ))

ये सब तो असर है प्यार मोहब्बत का
जो घर के बने व्यंजन अच्छे लगते है
रोटिया तो सब बनती है एक ही अनाज से
पर माँ के हाथो सूखी रोटी भी पकवान लगते है (( ६ ))

जीवन के इस अनजान सफर में
जब कुछ पल इतने हसीन लगते है
मिल जाते है दो दिलो के ख्याल जब
अजनबी भी अपने से लगने लगते है (( ७ ))

जमाने का दस्तूर ही कुछ ऐसा है
अपना कहा किया सबको अच्छा लगे
दूसरे की सुनने का वक्त किसके पास
अच्छी – सच्ची बात भी प्रवचन लगते है (( ८ ))

डी. के. निवातियाँ_______@@@

One Response

  1. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 17/09/2017

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