“हे ईश्वर ! तेरे अनुग्रह से”

एक नई कांति प्रपंच हुआ
मेरा लेखनी भी प्रखर हुआ
आज जहां का प्यार पाके
ज़िन्दगी मंगल-मंजुल हुआ

पहेले अतीत का गुलाम था
आज मन मेरा उन्मुक्त हुआ
मिट गया अंधकार ज़िन्दगी से
ऐसा दीप ज्ञान प्रज्ज्वलित हुआ

डूब चूका था आशा,साहस
आज फिर वो उदित हुआ
मन मेरा मुरझाया था
आज चंचल हर्षित हुआ

पहेले ज़िन्दगी मेरा विरान था
जो आज चहल पहल हुआ
पहेले स्मृति मेरा सहरा था
आज ज़िन्दगी मेरा सागर हुआ

हे ईश्वर ! तेरे अनुग्रह से
आज ज़िन्दगी मेरा अमीर हुआ
ख्वाहिश था कुछ कर दिखाना का
ओ सपना आज मुक्कलम हुआ

Leave a Reply