एक ही बार ..!

एक ही बार
कई कविताएँ; मेरी राह तकती है
पर मै अपना अटक जाता हूँ; यहां वहां
कमजोर हूँ; ईसलिए जरा रुक जाता हूँ
पर हमेशा ऐसा नहीं होगा
ताकत आएगी मेरे पैरो में
तब मै चल सकुंगा बिना रुके
खाईयों में; पहाडों पर; उंच निच दरख्तों से
और सवाना में तो; नज़र नहीं ठहरेगी मुझ पर
तब मै मंज़िल पे जाकर ही दम लुंगा
तब लिखुंगा एक कविता अपने होने से
एक ही बार .. !
तबतलक लिख लेता हूँ
कोई बहुत ही मिठा खयाल
रुक नहीं सकता बिना पुछे
देख लेता हूँ; हाल चाल
और चल पडता हूँ; आगे की और .. !

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