कोई नहीं सवाली

मेरे हाथ में कूंचा हैं
वरना मै फ़ाड देता तस्वीर
पाणी में डुबो-डुबोकर, और
टांग देता हवा में; काफूर होने के लिए; खैर,

बिल्ली के सींग निकल आए तो क्या हुआ
पूँछ तो मै काट ही सकता हूँ,
और खोद सकता हूँ अरमान

पर, मै दुआ मांगता हूँ कि याद आ जाए
और भूल जाए घोडे; ढाई घर चलना
सफेद रंग के आटे में ढूंढ ले अपना वजूद
और कटा ले टिकट वापसी का

वैसे, मेरे पलटवार करने से पहले
एक बात बताओ,
झूल आए हो झूला; बुन आए हो डोरी
जो दी मैने आँखों में; वो सुन आए हो लोरी
बेखुद मै तस्वीर किसी की; मेरा क्या भला
फ़ाडू भी तस्वीर तो क्या; होगी बात पूरी

आधी अधूरी बात ही; आती इन पंजो में
तुमने भी क्या गम लिया है; मेरे इन रंजो में
क्या होगा हासिल; अगर मै तस्वीर भी मिटाऊँ
मैने जो कुछ देख लिया है; तुम को भी बताऊँ
बेसूदी में रंगनेवाला; नारंगी नहीं होता
बेफिजूल ही देखनेवाला; हँसता है कोई रोता
कूंचे में रंगो में; होती है शरारत
तस्वीरों के साथ में; हादसा ये होता

मेरी भी तस्वीर किसी ने; ऐसीे ही निकाली
भूरी भूरी आँखो में और भर दी स्याही काली
चलो वफा से ध्यान दे अब; कर दे करम रवाना
मै अजन्मा; तुम अजन्मे; कोई नहीं सवाली

कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर

Leave a Reply