वक्त से पंजा लडाकर

हाथ सारा झनझनाकर गिर पडा
वक्त से पंजा लडाकर क्या मिला.

कर गया बर्बाद उसका क्या गया
न्याय का दर खटखटाकर क्या मिला.

हर घडी खुद से सवाल करता चराग
आग दामन में बसाकर क्या मिला.

कुछ पलों की थी बाकी जिन्दगी
सांस मुर्दों की चुराकर क्या मिला.

एक गल्ती पी गई पुण्य का सागर
देवता को आजमाकर क्या मिला.

रूप की तितली के पीछे चांद भागा
चान्दनी को जगमगाकर क्या मिला.

राह दिखलाने को फूंका अपना घर
पूछते हैं घर जलाकर क्या मिला.

दर्द केवल दर्द ही तकदीर है अब
आदमी का जन्म पाकर क्या मिला.

जो भी आया सुंघकर चलता बना
बाग में कलियां खिलाकर क्या मिला.

दास अब तहजीब में खंजर शरीक
सर झुकाकर गिडगिडाकर क्या मिला.

Leave a Reply