ग़ज़ल – कितनी मायूस हो उम्मीदे…

कितनी मायूस हो उम्मीदे हज़ार गुज़री है
गुजरी कितनी बेरंग अब के बहार गुज़री है

ठहरी वक्त के परों पे पल दो पल के लिए
गयी तो शाम ऐ सहर नागवार गुज़री है

उसकी निगाहो से रौशन बाम पे चाँद हंसी
सो जाये तो शम्मे सभी उतार गुज़री है

तू न आई मगर तेरी यादें तेरा अक्स
मेरे ख्वाबों के गुलिस्तां में हो शुमार गुज़री है

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