संत सरीखी बसंत ऋतु…

संत सरीखी बसंत ऋतु का अब आगमन हुआ है।
ह्रदय कमल,गंग जल से माँ वाणी का आचमन हुआ है।

कोयल गाकर राग मल्हार, मन मंत्रमुग्ध कर जाये।
तितलियों को कली से प्रेम के प्रति प्रतिबद्ध कर जाये।

भीनी-भीनी सुगंध में नवकोपलें भी ले रहीं अंगड़ाई।
भीगी ओस में पत्तियां हैं और अमराई भी बौराई।

धान की फसल पे किरणों का स्वर्णिम प्रकाश है।
मादक मौसम ,मस्त माह, मन में हर्षोल्लास है।

चाँद है ठिठका हुआ,तारों के सर भी झुक गये।
सूरज गर्व से ये पूछ रहा,राह में ही क्यूँ रुक गये?

चूड़ियों की चमक में इन्द्रधनुष के रंग हो गये।
आभूषणों से सुसज्जित गोरियों के अंग हो गये।

प्रेयसी के प्रेम पत्र में पिया मिलन की गुहार है।
ज्यों फागुन है द्वार खड़ा तुम कब आओगे पुकार है।

पीत पुष्प से प्रफ्फुलित भ्रमर का आज मन हुआ है।
संत सरीखी बसंत ऋतु का अब आगमन हुआ है।

वैभव”विशेष”

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