रात दिन पल पल-गजल-शिवचरण दास

रात दिन पल पल गुजरते जा रहे हैं
दिल मे हजारों दर्द पलते जा रहे हैं.

जिनकी तमन्ना ख्वाब में भी नहीं थी
खुद हमारे दर पर चलते आ रहे हैं.

कैसा किया है जादू यह परवर्दिगार ने
बर्फ मे लिपटे हुए पर जलते जा रहे हैं.

नया युग नई तहजीब अब इस देश में
सत्ता के वास्ते ही बस मरते जा रहे हैं.

इस तरफ कुआ है तो उस तरफ खाई
क्या चाहते हैं और क्या चुनते जा रहे हैं.

इस सदी से उस सदी तक का सफर
दिन रात की चादर बुनते जा रहे हैं.

है दास जब आइ तन्हाई भरी शाम
जाम मे ही नाम सब घुलते जा रहे हैं.

शिवचरण दास

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