हृदय-पुष्प

तुम
अनगिनत चुम्बनों से
भिंगो देते हो
मेरे पोर-पोर अनिंध्य देह को.

तुम
मेरे सुघड़ स्तनों को
जब मुँह घुसाये चूसते हो
तब भूल जाते हो
मेरे ह्रदय की सुंदरता को.

तुम
बेसुध हो जाते हो
चिकनी जांघो की सुंदरता देख
तब नहीं सोच पाते
कितने पाटो के बीच
कुचलता रहता है मेरा हृदय-पुष्प.

एक गुलाब
जबसे खिला है
जवानी की देहरी पर
जिसकी खुश्बू
उसी समय से समेट रखी हूँ
उसी खुशबू को
नहीं देख पाते तुम
और मैं जलती रहती हूँ
गीली लकड़ी के सामान रात-दिन.

Leave a Reply