मर्द का दर्द”कविता”

सोचो एक मर्द ने कितना दर्द पाया है।
स्त्री पर हाथ उठाया तो बेदर्द कहलाया है।
और न उठा पाया तो नामर्द कहलाया है।
गलतियाँ तो दोनों से ही हो सकती हैं कभी
मगर इल्जाम सिर्फ पुरषों पर ही आया है।

जब तक करते रहो पूरी ख्वाहिशें उनकी
बढती रहेंगी पल-पल फरमाइशें उनकी
तुम पति परमेश्वर,देवता,खुदा हो जाओगे।
या एक छत के नीचे हर ख़ुशी से जुदा हो जाओगे।

बचपन से जवानी तक तो बहुत सबल होते हो।
मगर जब आती है कोई जीवन में तो घुटनों के बल होते हो।
अब फैसला करो की कमजोर,लाचार और बेबस कौन है।
खुद्दारी से बोलने वाला आज किसी के आगे बस मौन है।

सबसे बड़ा उदहारण तो सास -बहू का दंगल है।
फिल्मों में सास ललिता पवार,ससुर ऐ.के.हंगल है।
हर रोज सुनता है वो बस एक ही ताना।
शर्मा जी के जितना तुम भी तो कमाना।

उनकी बीबी नए-नए हार बदलती है।
मेरे लिए कम से कम एक झुमका ही लाना
किसी का बेटा बनकर हर एक फर्ज निभाता है।
श्रद्धा पूर्वक ममता और दूध का कर्ज निभाता है।
बनकर पति ,पत्नी और माँ दोनों को सम्हाला ।
कभी माँ के ताने,कभी पत्नी का उलाहना पाता है।

पिता के रूप में बच्चों का हौंसला होता है।
नहीं तो घर,घर नहीं पक्षी का घोंसला होता है।
दर्द को अपनी मर्दानगी के चोले में ढकता है।
पुरुष बेचारा खुलकर रो भी नहीं सकता है।
वैभव”विशेष”

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