इस कदर इतिहास के पर्चे

इस कदर इतिहास के परचे बदलते जायेगें
हर खरे इन्सान के चरचे बदलते जायेगें.

अर्थ की कगार पर रिश्ते फिसलते जायेगें
दिल बदलते जायेगें चेहरे बदलते जायेगें .

कर्ज की हर सांस फिर भी दावा है यही
मुल्क की तकदीर के नक्शे बदलते जायेगें.

रोशनी हो या अन्धेरा है किसे परवाह अब
भूख की तस्वीर के चस्मे बदलते जायेगें.

धूप खाकर जी रहे हैं चान्दनी की आस में
सुख छली तजवीज के कुरते बदलते जायेगें.

रेत में लेकर चले हैं आज अपनी कश्तियां
जानते हैं जीत के नक्शे बदलते जायेगें.

लूटते हो जिस चमन को उसके पहरेदार ही
उस खुली जागीर के रकबे बदलते जायेगें .

दास बेबस क्यू भला यूं कातिलों के सामने
वक्त की तहजीब के लहजे बदलते जायेगें.

शिवचरण दास

3 Comments

  1. Dushyant patel 21/01/2015
  2. vaibhavk dubey वैभव दुबे 22/01/2015
  3. shiv charan dass dasssc 22/01/2015