हमारा मन

सोच तो समुन्दर की तरह है
अनदेखे मंजर की तरह है
गहराइयों में खो जाने को दिल करता है
इस असीम चाँद की छाँव में सो जाने को दिल करता है
हर कदम पर ऐसे पल आते है
बस उसी पल की पलकों में डूब जाने को दिल करता है
हमारी सोच का कोई किनारा नहीं
ये तो असीमित आसमान की तरह है
कभी ख़त्म ना होने वाले ज्ञान की तरह है
इस सोच का पिटारा खोल कर तो देखो
कितना खो जाते है हम कभी
अल्फाजो के जाल में उलझ जाते है हम कभी
शाम का पता ही नहीं चलता
बस लगता है वक़्त युहीं थम जाए अभी
कितना मुश्किल होता है अपने आप को छुपाना
खुद में खुदको ही ढूंढ पाना
बस सोच का ही तो खेल है ये
इस नाव को ही तो है हमें पार लगाना
उलझन से भरी हर घडी है यहाँ
रोकने को हमें खड़ी है यहाँ
जाने किस मोड़ पर सबक मिल जाए
पर हमारी सोच हर उलझन के आगे खड़ी है यहाँ
सोचा न था कितना कुछ बदल जाता है
सोच को बदलने से सब कुछ संभल जाता है
दाएरा बढाना हे इसका ताकि सब कुछ बदल जाए
हमारा नादाँ मन तो एक हलचल से भी बहल जाता हे
अनगिनत सपने लिए ये आवारा मन
ठोकरे खाता हुआ ये बेचारा मन
आशाएं भरे हुए है कितनी
अच्छाईयों का खजाना लिए ये हमारा मन

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