जागेश्वरम्

वो सर्द हवा की सनसनाहट
ठिठुर रहा तन प्रभात का
जागने का मानस नहीं
लालिमा में हरे पात का

दुग्ध- धवल सा हिमालय
छिपा कोहरे में दूर कही
नयनो से देखने की आशा
दिल-ए-मंदिर में बाकी रही

नई सुबह थी नया आलम था
हर तरफ थी नयी आवाज
मीलो दूर सूर्य किरणों से
चमक रहा स्वर्णिम हिम-राज

रुई के फाहों सा वो बादल
छाने लगा गहरी घाटियों में
भ्रम था या आँखों का सच
बन गयी सफ़ेद जमी वादियों में

चलने लगा कारवां वन में
दिखती घाटियां गहरी-गहरी
क़ुछ दिलो में था डर तो
कुछ नजरे ठहरी-ठहरी

वन की खामोशी टूट गयी थी
सारे तन में होता दर्द असीम
फिर भी ना हारा मन किसी का
जैसे जागेश्वर में खडा नदीम

लौट रहा थका हारा हुजूम
छा गयी थी घटा घनघोर
बारिश में नहा रहा जंगल
गूंजता रहा ओलो का शोर

दौड़ते रहे सब इधर- उधर
आख़िर मिल ही गया मुकाम
ठंड में पूरा खिला था चाँद
हो गयी थी सुहावनी शाम

लौटने का दिन आया
आरज़ू थी बेबस दिलो में
क्यों नही रुकता ये पल
खुशी के संग करता छल

बोझिल से कदम थे
आँखों में थी यादें अपार
लगने लगा सबको ऐसे
जीत कर भी गए हो हार
— : अश्विनी :—

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