आज़ादी

” कंट-जड़ित माला से ,जब श्रृंगार हुआ था ;
एक बहुभाषीय देश में, भीषण नरसंघार हुआ था;

जब जन्मे तब एक साथ थे, खेले तब भी एक साथ थे ;
खेत हमारे आस-पास थे, नदी और नाले साथ-साथ थे;
गन्ने तेरे गुड़ मेरा था,सरसों तेरी साग मेरा था;
चरती तेरी गायें जिसमें , हरा-भरा वो खेत मेरा था;
तेरी होली रंग मेरा था, ईद मेरी और संग तेरा था;
मन मुरीद जिससे हो जाए , आव-भगत का ढंग तेरा था;
कपड़े मैंने तेरे पहने , खाना तूने मेरा खाया ;
भिन्न पंथ के होने पर भी, खुदा ने हमको ख़ूब मिलाया;
पर पता किसे था दिन ऐसा भी, वो हमको दिखलायेगा;
सदा चहकता पिंड मेरा ये, लाशों से पिट जाएगा;
छोटी-छोटी गलियों में तब,लहू-सरिता का अविरल संचार हुआ था;
कंट-जड़ित माला से ,जब श्रृंगार हुआ था ;
एक बहुभाषीय देश में, भीषण नरसंघार हुआ था;

हाथ अगर थे, सर गायब था;
कहीं बदन से, पैर गायब था;
तिरछी नज़रें ,जँहा से आती;
नुक्कड़ वाला ,घर गायब था;
खेत तो थे, पर फसलें जल गयी;
घर की नाली नदियां बन गयी;
बड़-बड़ करती, “बूढ़ी काकी” ;
घर की एक , दीवार पे टंग गयी;
सुबह-शाम हर दरवाज़े से, केवल क्रंदन-गान था;
कंट-जड़ित माला से ,जब श्रृंगार हुआ था ;
एक बहुभाषीय देश में, भीषण नरसंघार हुआ था; ”