मेरा प्रिय जीव गधा

एक बार वाक प्रतियोगिता में
मुझे विषय मिला
मेरा प्रिय जीव.

मैने सर को सहलाया
और सादर फर्माया
दुनिया भर का सताया हुआ
सत्य मे अहिन्सा का धडा है
मेरा प्रिय जीव गधा है.
श्रोता सुनकर झल्लाये,
कुछ उठकर चिल्लाये
सडे अन्डे टमाटर बरसाये.
कहने लगे कथित भद्र्जन
शर्म नही आती तुम्हे
गधा तो निरा गधा है
केवल आदमी खरा है .
हमने कहा हुजुर गौर फर्मायें
जन्म से मर्त्यु तक हर आदमी को
कितनी बार गधा कहा जाता है.
लेकिन किसी गधे को आदमी कहा जाये
एसा एक भी उदाहरण बताये.
मैने तो मात्र गधे को
महान बताया है
लेकिन वैग्यानिकों ने तो मानव जाति को
चूना लगाया है
जो उदंड बन्दर हैं
उन्हे हमारा पूर्वज बताया है.
मुझे तो लगता है कि
आदमी और उसे गधा कहने की ललक का
मनव सभ्यता से गहरा नाता है
जिस पर हमे सर्वाधिक प्यार या गुस्सा आता है
उसे गधा कहने को हमरा मन ललचाता है.

अरे भाइ साहब
गधा तो गुणो की खान है
वास्तव मे वह बहुत महान है.
अगर पैट्रोल बचाना है
अर्थिक पिछडापन मिटाना है
कर स्कूटर ट्रैन सब बन्द कर दो
हरेक अधिकारी कर्मचारी को
एक एक गधा जारी कर दो.
अफसरों का गधा ब्रेड बटर जाम खायेगा
और सबको लाल पीली आंख दिखायेगा.
बाबू का गधा अपने हिस्से कीछोड
दूसरे की घास चर आयेगा,

बीमा कम्पनि और बैन्को को
खूब लाभ होगा
दुर्घटना व लोन का क्या काम होगा.
ट्रफिक पुलिस की भी छुट्टी हो जायेगी
कोल्तार की जगह मिट्टी की सडक चल जायेगी.
यदि दफ्तर जाना है देर हो रही है
काम निपटाना है अबेर हो रही है
चाहे तो पीठ पर बैठकर दाढी बनाईये
या गुनगुनाते हुऍ पेन्डीग फाइल निपटाइये.

अगर हडताल भी हो जाये
भीड काबू से बाहर हो जाये
वहां गधो की ड्युटी लगवायें
गोलियों की जगह दुलत्ती चलवायें
किसी की भी जान नहीं जायेगी
कमीशन ्की नौबत नही आयेगी.

गधा हमारी सभ्यता का
जीता जागता नमुना है
यह पक्का समाजवादी है
अहिन्सा का पाहुना है.
लाद दो जितना भी बोझ
कभी उफ न करेगा
जनता की तरह चुपचाप ढोता रहेगा.

वैसे तो सारे नेता अभिनेता
हमारा ही मजाक बनाते हैं
अपने चुनावी वादो से
हमे गधा बनाते हैं.
मुझे गान्धी जी पर गुस्सा आता है
समुचे भारतवर्ष मे कोई इन्सान नही मिला
इस लिये उन्होने
केवल तीन बन्दरों को ही
अपना आदर्श चुना.

हमने तो जिसे भी गद्दी सौंपी है
उसने ही पीठ मे छुरी घोंपी है.
अरे ओ सफेद्पोश भेडियो
खा गये देश को बेच बेच कर
काश मै भी गध होता
तो मारता दुलत्ती खीचकर
मगर अफसोस मैं तो सिर्फ आम इन्सान हुं
कैसे कह दूं गधे से महान हुं
रोता हूं चुपचाप बदानसीबी पर
अपने देश की नुक्ताचीनी पर
क्योंकि मै इस देश का नमकख्वार हुं
इसलिये शायद मैं ही
सबसे ज्यादा गुनहगार हूं.

शिवचरण दास

4 Comments

  1. bimladhillon 21/01/2015
    • shiv charan dass dasssc 21/01/2015
  2. vaibhavk dubey वैभव दुबे 22/01/2015
    • shiv charan dass dasssc 22/01/2015

Leave a Reply