आत्मबोध

आत्मबोध
मैं तो एक कण था
भ्रष्टाचार एक टन था
विश्वाास नहीं मगर कम था
आगे बढना मेरा धर्म था। मैं तो एक………..

फिर इक हवा चली
बहुत सारे कणों को मेरी तरफ मोङ दिया
मुझे हिमालय की तरह मजबूत जोङ दिया
मुद्दा सिर्फ इस दुनिया से भ्रष्टाचार मिटाना था
भ्रष्टाचार का एक टन तोङकर
हर एक कण को सच्चाई के रास्ते ले जाना था। मैं तो एक………..

मुझसे जागी है उम्मीदे सबकी
सबकी बातों को निभाता था
नए रास्तों पर चलकर
सच्चाई को बढाता था
नन्हें से छोटे बालक के दो शब्द थे मेरे लिए
सत्य, अहिंसा को मुझे अब बचाना था। मैं तो एक………..

टूटना टन का इतना आसान नही था
मेरे पास भी कोई ऐसा सामान नही था।
मैं सत्य को झूठ से टकराता चला गया
मेरा तो ये धर्म था, जितेंगे हम मेरा यही प्रण था। मैं तो एक ………..

कभी-कभी घबरा जाता था
पानी आँखों में आ जाता था
तब आकाश को जब देखता था
शायद वहाँ कोई देवता था
फिर वो कहा करता था
एक दिन सभी यहाँ आएँगे
ये टन छोटे-छोटे कणों में बदल जायेंगे
तो फिर घबराना किस बात का
ये तो सृष्टी का ही एक चलन था
मैं तो एक कण था।
हर्ष सेठ
मो-09911277762

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