उस दफ्तर क्या कहना

मक्खी मच्छर स्वागत गायें
उस दफ्तर का क्या कहना
अफसर सारे गाल बजायें
उस दफ्तर का क्या कहना.

मर गये कलम बस घिस घिसकर
फाइल को अर्पित नैन किये
सब उनको ठेंगा दिखलायें
उस दफ्तर का क्या कहना.

हर और महामक्खनबाजी
और चमचों का ही जमघट है
सबको नाकों चने चबायें
उस दफ्तर का क्या कहना.

उपर से तो मुस्काते हैं
पर कुर्सी सब खिसकाते हैं
रोज नई मेमों पकडायें
उस दफ्तर का क्या कहना.

बस बहुत शाबाश कहें
सी आर मगर है टायं टायंकर
सबको हंसकर गले लगायें
उस दफतर का क्या कहना.

है यौवन की हर छटा यहां
हर छटा यहां पर यौवन है
फाइल में लव लेटर आयें
उस दफ्तर का क्या कहना.

कःउब रगडते नांक यहां
साहब के दौलतखाने पर
काम नहीं करते कुछ भी
सबको रखते हडकाकर
चमचे ही प्रमोशन पायें
उस दफ्तर का क्या कहना.

कैसे कैसे डर की खातिर
लोग यहां पर बिकते हैं
सच कहना है जुर्म यहां
कुछ कहने से डरते हैं
सिद्धांत हुए निर्जीव यहां
और नियम यहां पर सडते हैं
कर रहे घरों की निलामी जो
उन पर ही नोट बरसते हैं
बस भ्रष्ट यहां पलते बढते
और सीधे सादे फंसते हैं
फर्जी सारे केस बनायें
उस दफ्तर का क्या कहना.

बीमा से बीमार बनाकर
छोड दिया है ग्राहक को
ग्राहक को भगवान बतायें
उस दफ्तर का क्या कहना.

शिवचरण दास

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