बोधिसत्व वृक्छ योनि में रुक्खधम्ब जातक

एक जन्म में आये बोधिसत्व वृक्छ देवता बन
बड़े बड़े तरुओं से घिरा शाल वन सघन
ढूढ रहे थे लोग सुरक्छित जगह निवास के लिए
रहो घने वृक्छों की छाया में वृक्छ देवता बोले

जहाँ अकेला वृक्छ खड़ा रहना न वहां भूलकर
वृक्छ समूह जहाँ हैं रहना वहीँ श्रेयस्कर
नहीं अकेला वृक्छ तुम्हे आश्रय दे पायेगा
आंधी पानी से वह तुम्हे बचा न पायेगा

बुद्धिमान लोगों ने बात मान लिया
सघन वृक्छों के नीचे ही निवास बनाया
मूर्खों ने सोचा हम क्यों जंगल में कुटी बनायें
खुली जगह में एक एक पेड़ चुने आवास बनायें

आंधी आयी एक दिन संकठ के बदल छाये
वृक्च अकेले जहाँ जहाँ थे वायु वेग न सह पाये
जड़ से उखड़े दूर जा गिरे लोग हो गए बेघर
पहुंचे बोधिसत्व के पास अपना दुखड़ा लेकर

सघन वृक्छ सब एक साथ खड़े थे
तेज हवा के आगे चट्टान से अड़े थे
उनकी छाय में दिया आश्रय विस्थापितों को
सही जगह साथ रहने की सीख मिली सबको

लल्लन प्रसाद

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