संध्या मिलन

प्रभात का निकला फेरा
मिलन हुआ मध्याह्न से !
दोनों मिलकर संग चले
मिलने नीलवर्ण साँझ से !!

गगनमंडल ने बेला सजाई
अलंकृत स्वर्ण रंजीत रवि से !
देख सागर की लहरे तड़पी
गोधूलि की निखरी छवि से !!

सूरज हुआ मध्यम-मध्यम
चन्द्र छवि के आगाज से !
पंछियो ने करलव किया
जैसे सरगम के साज से !!

मंद मंद पवन बही
उन्मादित भरे जोश से !
मिलने चला नील गगन
धरती, हुई मदहोश से !!

रमणीय हुआ अद्भुत पल
तारामंडल की चकाचौंध से
नव वधु सी सज उठी संध्या
निशा मिलन की प्रलोभ से !!

!!!!—–शुभ संध्या—–!!!

डी. के. निवातियाँ____###

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