विकसित हो रहा विनाश

टूटा आस
अब कहाँ बुझाएं प्यास ?
बिखर गया आशियाना.
छूट गया आवास .
पूछ रहा बेज़ुबान.
अए मनुष्य महान ?
उठने की लालसा ने ,
तेरा कितना मानसिक स्तर गिराया
कितने नोचे चरिन्द-परिंदो के आशियाने,
कर वृक्षों का सफाया.
जिसने दी तुझे फल और छाया,
जीवन को जिसने संतुलित बनाया,
जिन्हे तू पूजता आया.
विकसित नगरों के निर्माण से,
कितने गए प्राण से ?
पर मनुष्य तो गगन चूमने में व्यस्त है
आधुनिकतम जीवन-शैली में मस्त है.
हरी-भरी स्थलि
अब बनी मरुस्थली.
सूखे सारे के सारे नदी-नाले,
बादलों को बूँद के पड़े लाले .
उँचाईओं को छूने की ओज में,
नूतनता की खोज में
अपनाया जो शैली
जीवन की स्वस्छता हुई मैली.
पथ अपनाया जो विकास का
मंज़िल न मिल जाये विनाश का.

*मो. जुनैद अहमद *

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