नवगीत

ख़ूब सभाएँ करो बैठ अब
सासें चलना
बंद हो गया .!!

सत्य अपाहिज
कैद जेल में ,
जान गई बस
खेल-खेल में !
निर्बल मौन साधने से क्या
उनका छलना
मंद हो गया ..!!

दंड भोगते
बिना बात ही ,
अपराधी दिन
और रात भी !
सत्ता की कालिख गहराई
मोह ,न्याय से
भंग हो गया …….!!

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