वैशाखियों से पांव की फरियाद

वैशाखियों से पांव की फरियाद करते रह गये
दलदलों से राह का आह्वान करते रह गये.

प्रपंच की भाषा बहुत सम्पन्न भाषा बन गई
जिन्दगी भर व्यर्थ ही अनुवाद करते रह गये.

नफरतों की धुन्ध ने आंखो को अन्धा कर दिया
लोग अपने साये की पहचान करते रह गये.

बहुत कच्ची थी बुनियाद घर की गिर गया
खन्डहरों का नाम बस कि ताज धरते रह गये.

भूख ने इन्सान को एक बार फिर से डस लिया
भक्त मन्दिर में मिठाइ दान करते रह गये.

हक हमारा ही हमें ना मिल सका कभी
युगयुगो से क्रान्ति का गुणगान करते रह गये.

दास अब आदाब का अन्दाज कितना है नया
चाबुकों से प्यार का इजहार करते रह गये.

शिवचरण दास

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