एक लडकी

मासूम सी एक लङकी थी उम्र थी बाइस ,
काम के बोझ से उम्र लगती थी अठाइस ।
वो हसंती थी दुनिया को दिखाने के लिये ,
उसकी आॅंखे काफी थी उसकी सच्चाई बताने के लिये ।
कितनी अकेली थी वो इस भीङ वाली दुनिया मे ,
कोई नही है उसका ,यही गम था उसके मन मे ।
वो सन्तुष्ट थी अपनी जिन्दगी से पर ज्यादा नही ,
अरमान उसके भी थे पर कोई इरादा नही ।
चाहती थी वो ,कि
कोई उसकी जिन्दगी में आये,उसे हसांये ,
दुख तकलीफ मे उसके काम आये ।
जिसकी जिन्दगी मे उसकी खास जगह हो ,
जो जान से ज्यादा उसे चाहता हो ।
जो तोङे ना उसका किया हुआ कोई वादा ,
पर क्यो नही हो रहे ख्वाब उसके पूरे ,
माॅंग तो नही रही वो बहुत कुछ ज्यादा ।

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