मन को इतना अधिक रूलाया-शिवचरण दास

मन को इतना अधिक रुलाया
तन का दरिया सूख गया
जिस दर्पण में चेहरा देखा
वो दर्पण ही टूट गया.

बून्द बून्द से भरा सरोवर
और सरिताओं से सागर
सागर में मिलते ही सारा
सरिताओं का रूप गया.

एक तरफ आकाश है ऊंचा
एक तरफ गहरी खाई
गिरना उसका लाजिम है
जो भी थोडा चूक गया.

हद से ज्यादा रूप किसी का
आफत का है परकाला
एक कली जब खिली बाग में
जो भी आया चूम गया.

वक्त ने देखो फैला दी है
मीलों तक दुख की चादर
सुख का छोटा टुकडा देना
ऊपर वाला भूल गया.

खून पसीने से सींचा है
हमने अपनी धरती को
जिसको पहरेदार बिठाया
वो ही आखिर लूट गया.

ताकत की मदहोशी में जो
जुर्म सभी पर करते हैं
गद्दी जिसे मिली आजकल
अपनी भाषा भूल गया.

कैसा रूखा सच का चेहरा
झूंठ दमकता रूप लिये
जिसने कि सच को अपनाया
उससे ही जग रूठ गया.

दास तुम्हारी जिद की खातिर
हम सूली पर चढते हैं
जबसे तुमको है अपनाया
अपना घर वर छूट गया.

शिवचरण दास

Leave a Reply