तेरे कहने पे

तेरे कहने पे

खटकता हु जमाने की नजर,
कड़वा हूँ, क्युकी सच बोलता हूँ !
मीठा बन सकता हूँ तेरे कहने पे
फिर इल्ज़ाम न रखना मुझ पर
कि यार, झूठ बहुत बोलता हूँ !!

अखरता हूँ, चलता अपनी डगर
लगता है सबको जैसे मै टेढ़ा हूँ !
सरल बन सकता हूँ तेरे कहने पे
गर तोहमत न लगाए मुझ पर
कि यार, दूरियां बहुत रखता हूँ !!

मतलब रखता हूँ अपने से अगर
तो दुनिया को बेवकूफ लगता हूँ !
व्यवहारकुशल बन सकता हूँ तेरे कहने पे
शिकायत फिर तुम न करना मुझ से
कि यार, स्वार्थी बहुत बनता हूँ !!

करता हूँ बाते सीधी दर-बदर
दुनिया को नास्तिक दिखता हूँ !!
आस्तिक बन सकता हूँ तेरे कहने पे
उलहाना फिर तुम न देना मुझे
कि यार, तमाशा बहुत करता हूँ !!

डी. के. निवातियाँ_________###

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