खुदगर्ज

जब खेल कर घर में आता था।
तब तुझसे लिपट मैं जाता था।
भूख-भूख कहने से पहले
मैं खाना सामने पाता था।
देखते हुए टी.वी सो जाता था।
सुबह चादर में लिपटा पाता था।
आज जब दफ्तर से आता हूँ।
पहले बच्चों को गोद में उठाता हूँ।
बीबी के लिए उपहार लाता हूँ।
एक कमरे में तुम भी बैठी हो तन्हा।
माँ बस तुम्हें भूल मैं जाता हूँ ।
तभी तेरी कांपती आवाज आती है।
कैसे हो बेटा बाहर पूछने आती है।
लड़खडाते कदमों को सहारा भी नहीं देता।
पर तू ममता की हर रस्म निभाती है।
झल्ला के मैं चिल्लाता हूँ तुम्हें चैन नहीं है।
कोई भी तुमसे मिलने को अब बैचेन नहीं है।
गालों की झुर्रियों पे आंसू की लकीर बन जाती हैं
धीमे से कहती,अब आँखे दूर से तुम्हें देख नहीं पाती हैं।
बचपन में कहता था माँ मैं तुमसे जाऊंगा दूर नहीं ।
और ये वादा तो निभाया भी आज भी हूँ दूर नही ।
तेरे ही घर में तुझको एक पुराना सा कमरा देकर।
एक महकता पलंग और फटी हुई चादर देकर।
आज पास होकर भी मैं तेरे पास नहीं।
माँ तेरे दूध के कर्ज से बढकर पैसा है।
खुदगर्ज हुआ ये फर्ज निभाया कैसा है।
लालच में मैं कितना बदल गया हूँ
मगर माँ तेरा प्यार आज भी वैसा है।
मगर माँ तेरा प्यार आज भी वैसा है।
वैभव”विशेष”

2 Comments

  1. virendra pandey VIRENDRA PANDEY 16/01/2015
    • vaibhavk dubey vaibhavk dubey 18/01/2015

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