तम दूर भगाएं

अंदर का अंधकार मिटायें,
धरती का तम दूर भगाएं.
घनघोर निराशा अन्धकार छाई है,
हर ओर अन्धकार आज भाई है.
मर रही मानवता से ये तबाही है,
चहूँ ओर हमने मुँह की खाई है.
प्राकृतिक आपदा से और अप्राकृतिक विपदा से,
कहीं न कहीं हम जूझ रहे,
कारण फिर भी न बूझ रहे
कहीं मंहगाई की मार और भरष्टाचार,
तो कहीं मज़लूमों पे शोषण और अत्याचार,
कहीं रंग भेद कहीं सम्प्रदायवाद,
तो किसी से सीमा पर विवाद.
हम भाषा को ले झगड़ते ज़रूर हैं,
पर मितभाषा से दूर हैं,
जो दिलों की दूरी मिटाता है,
और अंतर्मन का तम दूर भगाता है.
कोई घी के दिए जलाता है,
कोई खाली पेट ही सो जाता है.
दूसरों का सुख देख हम सूख रहे,
इसलिए हम हज़ार दुखों से जूझ रहे,
आज दिवाली के इस क्षण,
क्यों न लें हम प्रण.
मन में मानव प्रेम की दीप जलाएंगे,
धरती का तम दूर भगाएंगे.

* मो. जुनैद अहमद *.

Leave a Reply