भगवान

अब की बार मैं ऐसा देश बनाऊँगा
इन्सान बनाने से पहले वहाँ मजहब बनाऊँगा
बहुत से मजहवों में हक इन्सानियत
का मजहब बसाऊँगा
कोई रहे न रहे मैं उसमें खुद ठहर जाऊँगा
अब की बार मैं …………………..

तुम चलाना अपने महजब को
मैं इन्सानियत में बस जाऊँगा
तुम तोङना दिलों को
मैं इंसानों में बस जाऊंगा
इंसानों में इंसान बसाकर
मैं फिर से दुनिया बसाऊँगा
अब की बार मैं ………………….

टूट सकते है दिल
मजहब भी बदल सकते है
पर हर खून में बसी इन्सानियत को
तुम तो क्या मैं भी फिर न बदल पाऊँगा
अब की बार मैं …………………………

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