नाकाम इश्क

हालातों के दिए जख्मों क़ो हँस के मैं यूँ ही सह गया।
अंजाम तक न पंहुचा मेरा नाकाम इश्क रह गया।
वक़्त की ठोकर में गिरता सम्हलता रहा।
चाहत का मेरा आशियाँ पल भर में यूँ ही ढह गया।
वो मिले थे इक नज़र में अपना बना गये थे
सांसों में धडकनों में दिल में समा गये थे।
मासूम सी हँसी में शरारत कोई छुपी थी।
खामोश आँखों से वो हाल दिल का बता गये थे।
मगर मंजिल थी न एक राह में मैं तन्हा रह गया।
अंजाम तक न पंहुचा मेरा नाकाम इश्क रह गया।
जब इजहार करके उनके चेहरे को हम पढने लगे।
वो पलकें झुका के मुस्कुरा के शरमाँ के फिर चलने लगे।
हम रोज उनकी राहों में पलकें बिछाए बैठे थे।
वो भी इसी इंतजार में उस राह से गुजरने लगे।
मगर आँखों में भर के आंसू वो अलविदा कह गया।
अंजाम तक न पंहुचा मेरा नाकाम इश्क रह गया।
टूटा नहीं हूँ अब तलक तेरा इंतजार हैं मुझे।
तू भी नहीं है बेवफा ये ऐतबार है मुझे।
लौटकर आऊंगा तेरा दामन मैं थाम लूँगा
और तुझको दिखा दूंगा की कितना प्यार है मुझे।
प्यार के आगे तो कांटा भी फूल हो गया।
अंजाम तक न पंहुचा मेरा नाकाम इश्क रह गया।
वैभव”विशेष”

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