कौन कहां जाता है

सब के सब यहीं के यहीं रहते हैं
जाता है बस लंगड़ा सूपना,
उसके साथ जाती है उसकी सांसें
कुछ कमाई अच्छाई के।
जाने के बाद कहां खो जाती हैं सारी की सारी चीजें-
पेन
कागज
किताबें
यूं ही आलें पर पड़ी खामोश
इंतजार करती रहतीं
कोई तो हो जो पल्टे पन्ने अतीत के।
पीछे छूट गई-
स्मृतियां,
यादें
कुछ बातें
चंद हंसी के लहरियां
जो टकराती हैं दीवारों से।
कहां घूम आता है व्यक्ति-
जाने के बाद
किस गाम
कौन से धाम में करता है निवास
कोई पता हो तो चिट्ठी भी लिखें।
जरूर किसी न किसी गुहा गहवर में रहता होेंगे मेरे तेरे पुरखे-
जहां शीत-उष्ण का असर बेअसर होता हो,
नहीं खरीदते होंगे महंगे स्वेटर,
निकेत होंगे शायद,
घुले आसमान में विचरते होंगे
किसी और ही ग्रह विग्रह के वासी।
आवाज लगाता हूं-
कई दफ़ा रात बिरात
पर पर अनुगंज होती
मेरी की पुकार मेरे कानों से टकराती
लौट आती हैं मेरी दुनिया में।

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