कलम का वीर

उठ जा कातर पुरुष उठ जा
मनस्तिथि धूमिल हो गयी , चरित्र पतन की ओर झुक गया |
क्रोध का ज्वलित पवन , आज कैसे रुक गया ??

जग सारा खिन्न है तुझसे , ममता कलंकित हो गयी |
पूर्वजो की वीरता , इतिहास बन के रह गयी ||

अब भी समय है , दृढ़ हृदय से कलम को तैयार कर |
शब्दों के हे वीर लेखक , चल शब्द संग्राम कर ||

—- कवि कौशिक (१ मई २००१)

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