कवि की कल्पना

इस खोखले वृक्ष पर जब देखता हूँ कभी
तो सोचता हूँ, इस पर भी कभी पक्षों बैठा होगा
हाँ उस सामने वाले वृक्ष को तरह
यह भी कभी महका होगा।
कोयल की क्रूर धुंध में इस पर भी सुनाई देती होगी।
दूर से कोई जब सुनता होगा
तो उसे इस पर अपने दिल की आवाज सुनाई देती होगी।
की है हरियाली तू जिस तरह दिख रही है
उस तरह मेरे जीवन में भी आएगी।
कवि की कल्पना को रोने से पहले उसे ऊपर उठाएगी।
इस खोखले वृक्ष पर ……………….

पर वृक्ष के वृक्ष खोखले क्यों होए जा रहे है
और यह वृक्ष हमें क्या समझा रहे है
कोयल का जाना क्या यर्थाथ है
इसका क्या भावार्थ है
अब हम किस धुएँ को ला रहे है
आगे बढने की चाह में हम क्या चाह रहे है
अब जहाँ कैसा होगा
क्या वे भी इस वृक्ष जैसा होगा
इस खोखले वृक्ष पर ……………….

तोङने नही देता था माली कभी
अपने बाग के दो पत्ते भी मुझे
वो माली कहां चले गए
अब वृक्ष क्यों खोखले हो गए सबके
ये वृक्ष कहाँ जा रहे है
ये पक्षियों को कहाँ ले जा रहे है
जब वृक्ष धरती पर ऐसा होगा
तो दुनियाँ का नक्शा कैसा होगा
इस खोखले वृक्ष पर ……………….

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