जाना पहचाना चेहरा

– राकेश चौबे

आज सुबह एक अधेड़ उम्र के आदमी को देखा
वह मेरी तरफ घूर रहा था.
उसे अपनी तरफ देखता देख मैं ने अपनी नज़र फेर ली
उसने भी नज़र हटा लिया
फिर मैं अपने रास्ते चल दिया

उसकी शक्ल बड़ी जानी पहचानी थी
उसे मैं ने सालों पहले जब देखा था
उसके चेहरे पर कितनी चमक थी
तब वह आज की तरह नहीं था
काले बाल थे, आँखों में आशाएं थी
और चाल ढाल में अकड़ थी

पर आज तो उसे देख कर अजीब सा लगा
बालों में सफेदी दिखने लगी थी
त्वचा ढीली हो चली थी
पर उसकी आँखों में असल फर्क था
उन आँखों में एक दास्तान थी
वे आँखें बोलती थी

उनमें समझौता था,
समाज के साथ
उसने चुना था रास्ता अपना
और एवज में कुर्बानियां दी थी
कुछ चीज़ों पर उसने दाँव लगाया
और हार! वो भी नज़र आती थी

उन आँखों में.
कहीं थोड़ी ख़ुशी भी झलकती थी
थोड़ी उम्मीद भी नज़र आती थी
पर जीवन के बेदर्द सफ़र की
थकान थी उन आँखों में

इस बन्दे को मैंने कई दफा देखा है
इसके लिए बहुत किया भी है मैंने
और इसे बहुत कुछ करते भी देखा है
लगा रहता है जीवन के जटिल यात्रा में
सीधी राह खोजता यह इंसान

रोज सुबह इस शख्स से दीदार होती है
वह मेरे आईने में रहता है.

2 Comments

  1. bimladhillon 19/01/2015
    • चचा चौबे 17/09/2015

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