आदमी की सांस है-गजल-शिवचरण दास

आदमी की सांस है आस का बसेरा है
नित नई शाम है नित नया सवेरा है.

बन्द मुठ्ठी में नये सपनों की महक
हर कदम पर बिखरा रंग अब सुनहरा है.

राह मुश्किल है मगर मायूस ना हो एसे
धुन्ध के पार ही तो रोशनी का घेरा है.

अजनबी स्वयं से कब तक रहेगा कोई
है आस्था में ढलता प्यार का ककहरा है.

भर सकोगे जितनी मुठ्ठी मे धूप भर लो
फिर ना मिलेगा मौका सूरज जरा ठहरा है.

इस भीड से युं बचकर और कहां जाओगे
अब तरफ यहां पर भीड का ही पहरा है.

शिवचरण दास

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