ऋतुराज

फूलों की घाटी में
तितलियों और भौरों का सैलाब
उमड़ पड़ा है
कितने फूलों को चूमे कहाँ कहाँ बैठें
किसके पास जाये
किसे छोड़े
रंगो के मेले में खोने का अवसर
रोज़ रोज नहीं आता
यह तो ऋतुराज है
जो ऐसे अवसर देता है

लल्लन प्रसाद
(माटी की महक, साहित्य प्रकाशन
मयूर विहार दिल्ली)

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