पीर पत्थर की लकीर-गजल-शिवचरण दास

पीर पत्थर की लकीर है
हर कोई सुख का फकीर है.

एक बच्ची सी उछलती जिन्दगी
हो गई बस आजकल गम्भीर है.

आसमानी रंग की चूनर उडा
मल रही धरती किसको अबीर है.

प्यार की खुशबू कभी मिटती नहीं
सब दुखों की यह दवा अकसीर है.

मजहबों की ऊंची मीनार हैं मगर
कितनी कच्ची अब भी ये शहतीर है.

कोई महलों में कोई फूटपाथ पर
दर्द से बैचैन हर तकदीर है.

लगालों गले अब भी शोषितों को
उनके हाथों मे सजी शमशीर है.

रोज एक बस्ती में खूनी प्यास है
हर शहर की बन गई तस्वीर है.

दास हर युग में गरीबों के गले
रोज पहनाई गई जंजीर है.

शिवचरण दास

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